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चलो कान्हा एक काम करते है , सलोनी जी

"मेरे और मोहन के दरमियाँ बसा है इश्क अजब मेहमान हो कर ...
इधर ज़िस्म हो कर उधर जान हो कर"

चलो कान्हा
आज एक काम करते हैं
इस मेहमान इश्क को भी हटा देते हैं
इस जिस्म को फना कर
जान को जां में मिला लेते हैं
तुम मेरे मैं तुम्हारी सनम
इस फर्क को भी आज मिटा देते हैं
तुम समा जाओ मेरी यादों में यूँ
फिर इन यादों को भी भुला देते हैं
तुम आओ मेरी आँखों में यूँ
कि नमी को भी जगह न मिले
नम आँखों को भी सुखा देते हैं
तुम आओ मेरी सांसों में यूँ
कि आहें रहें ही ना
शुष्क हर शै को महका देते हैं
तुम बस जाओ मेरे हर एहसास में यूँ
कोई हरकतें ही न रहें
मेरे ना होने को ही रवां करते हैं
तू तू करती मैं रहूँ ही ना
संग तेरे संगिनी को यूँ
फना कर देते हैं
तुम तुम ही रहो
मेरे होने का वजूद मिटा देते हैं
सांवरे
आज फिर एक तड़प उठी है
तुम आओ इस तड़प को हर लो
विरह भी ना रहे मुझे तुम कर लो
आज तुम अप्राकृत हो जाओ
या मुझे प्रकृति कर दो

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