*मेरी वन्दना , मेरी निधि तुम ही हो ...*
श्यामसुन्दर क्या कभी जीवन संभव है तुम्हारे बिना प्रियतम ॥जीवन के जीवन तो तुम ही हो प्यारे तो बिना तुम्हारे कहाँ कोई अस्तित्व भी मेरा ॥तुम्हारे होने से ही तो मेरा होना है उर धन मेरे ॥जो तुम साथ नहीं तो मैं हूँ ही नहीं ॥ तुम्हारा वियोग मेरा स्वयं से ही तो वियोग है प्रियतम ॥क्या कभी स्वयं से स्वयं को दूर किया जा सकता है । क्या स्वयं को भूलना संभव है प्यारे ॥मुझमें अब मैं शेष ही नहीं केवल तुम ही तुम तो हो मुझमें प्यारे ॥ प्यारे तुम ही तृषा हो मेरी और तुम ही तृप्ति ॥तुम ही पीडा हो और तुम आराम ॥ संयोग भी तुम हो और वियोग भी तुम ॥ जागृति भी तुम्हीं स्वप्न भी तुम्हीं ॥चेतना भी तुम्हीं चेतनता भी तुम्हीं हो । समस्त पुण्य भी तुम हो और पुण्यफल भी तुम्हीं ॥ ज्ञान भी तुम्हीं भक्ति भी तुम्ही हो ॥ मेरी स्मृति भी तुम हो और विस्मृति भी तुम हो बोध भी तुम हो प्यारे और अबोधता भी ॥ समस्त क्रियायें भी तुम और क्रियाशून्यता भी तुम ॥मेरा समस्त सौंदर्य भी तुम हो और गुण भी तुम ॥मुझमें ऐसा कुछ है ही नहीं जो तुमसे परे हो ॥ प्यारे ये प्रेम भी तुम हो प्रेमी भी तुम्हीं ॥श्यामसुन्दर ये कैसा विचित्र संबंध है प्रियतम की कोई ऐसा पल ही नहीं मेरा जहाँ तुम नहीं ॥तुमसे क्षण भर की भी दूरी स्वीकार ही नहीं प्यारे ॥प्रियतम ये श्वासें तुम्हीं से प्राणित हैं ये हृदय तुमसे ही स्पंदित ॥ जीवन का प्रतिक्षण केवल तुम्हारे ही लिये है ॥ मैं हूँ ही तुममें तुमसे तुम्हारे लिये ही प्रियतम ॥ तृषित ।। जयजयश्रीश्यामाश्याम जी ।।
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