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श्री राधा की एक विरह स्थिति , अमिता दीदी

श्री राधा की एक विरह स्थिति
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श्री प्रिया आज अत्यंत व्याकुल हैँ । श्री कृष्ण के वियोग में विरहणी हुई अत्यंत व्याकुल हो वन में पहुंच गयी हैं। प्रत्येक वृक्ष को पूछती हैं क्या तुमने कान्हा को देखा है ? प्रत्येक वृक्ष के सामने खड़ी होती हैं बात पूछती हैं फिर मौन हो जाती हैँ।

   उनकी आँखों से निरन्तर अश्रु प्रवाहित होने लगते हैं। अब श्री प्रिया किसी वृक्ष से पूछ नहीं रही दौड़ दौड़ वृक्षों का आलिंगन करती हैं। तुम ही मेरे मोहन हो। तुम ही मेरे कान्हा हो। तुम हो न। कुछ देर आलिंगन करती हैं जोर जोर से रोती हैँ फिर आँख खोल देखती है। नहीं तुम तो मोहन नहीं हो।

     अभी एक गईयां को ही मोहन मान बैठी है। पुनः पुनः उसी का आलिंगन कर रही है। निरन्तर अश्रु प्रवाह हो रहे हैं। सहसा वो गाय रंभाने लगती है। श्री प्रिया अत्यंत व्याकुल हो जाती हैँ। नहीं तुम मोहन नहीं हो। कुछ देर पश्चात एक मयूर को आलिंगन में ले लेती हैँ। हाय मोहन तुम अब तक कहाँ थे। पुनः पुनः बाँवरी विरहणी रुदन करती है।

     कुछ समय पश्चात वहां श्यामसुन्दर आ जाते हैं । उन्हीं के सन्मुख खड़ी हो पूछने लगती है क्या तुमने मेरे मोहन को देखा है ? कान्हा कहाँ चले गए हैँ ? मुझे अकेला ही छोड़ गए । देखो मेरी देह में प्राण और अधिक नहीं ठहरेंगे। मेरे कान्हा कहाँ हैं तुम बता दो मुझे। श्यामा ! श्यामा ! देखो मैं ही तो तुम्हारा कान्हा हूँ । मोहन हूँ तुम्हारा। तुमसे दूर मैं कहाँ रह सकता हूँ। नहीं नहीं तुम कान्हा नहीं हो। तुम मुझे अपना स्वरूप् दिखाओ। मुझे भर्मित नहीं करो। तुम कोई वृक्ष हो या कोई गाय या कोई मयूर। मेरे संग परिहास नहीं करो । मेरे प्राण अत्यंत व्याकुल हैँ। मुझे कहो मोहन कहाँ हैँ ? हाय !! मेरे कान्हा कहाँ चले गए। मुझ विरहणी के प्राण क्यों नहीं चले जाते। अत्यंत व्याकुल हो श्यामसुन्दर के आलिंगन में ही मूर्छित हो जाती हैं।

    श्यामसुन्दर उन्हें गोद में ले बैठ जाते हैं। सभी सखियाँ उनके इर्द गिर्द एकत्र हो जाती हैं। बहुत समय पश्चात श्री श्यामा अपनी आँखें खोलती हैं । स्वयम् को श्यामसुन्दर की गोद में पाती हैं । उनके इर्द गिर्द खड़ी हर सखी भी उन्हें श्यामसुन्दर प्रतीत हो रही हैँ। हर और श्यामसुन्दर ही प्रतीत होते हैं। अब श्यामसुन्दर उन्हें आलिंगन में लेते हैं और बहुत समय पश्चात श्री प्रिया चेतनता प्राप्त करती है। ओह श्यामसुन्दर ! तुम मुझे छोडकर क्यों गए थे। अब कभी मुझसे अलग नहीं होना। श्यामसुन्दर हँसते हँसते श्री प्रिया जू को पुनः आलिंगन में ले लेते हैं।

    इस अद्भुत प्रेम की जय हो।

      जय जय श्री राधे

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