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कैसे धीरज धारूँ मनमें

कैसे धीरज धारूँ मनमें।
तुम बिनु रमत नाहिं मनमोहन! यह मन घर वा वन में॥
तुम ही कों ढूँढ़त यह इत-उत आतुर ह्वै कन-कन में।
जदपि तुम्हीं सब हो, पै यह तो मोह्यो स्याम-रतन में॥1॥
हिय की हिलग होत अपनी ही, आत न कहन-सुनन में।
करत रहत हियकों वह आतुर हुमकि-हुमकि छिन-छिन में॥2॥
सब कुछ तुम हो, तदपि सबहि लखि चैन नाहिं नयननमें।
ललकि-ललकि खोजहिं अपनी निधि प्रियतम! ये कन-कन में॥3॥
कहा कहों, जानहु तुम सब कुछ, बूझहुँ हौं हूँ मन में।
मेरी बूझ अबूझ भई, पै तुम क्यों सूम करन में॥4॥
हो उदार-चूड़ामनि, फिर क्यों देरी करहु सुनन में।
टेरि-टेरि हार्यौं मैं, पै क्यों टेर न परी स्रवनमें॥5॥
अब जनि देर करहु मनमोहन! अगिन लगी प्रानन में।
दरस-सुधा दै सींचहुगे तो बात बनहिगी छिन में॥6॥

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