Skip to main content

अभिन्नता को जीवंत कीजिये तृषित

अभिन्नता को जीवंत कीजिये यह आपको परम् रस से सहज एक कर देगी - सत्यजीत तृषित ।
अभिन्नता को जीवन्त करने हेतु स्वयं को हर रूप में जी लीजिये । एक जल की बुंद से , एक रज कण तक सब । कभी पवन , कभी पाषाण , कभी पुष्प , कभी काँटा सब जी लीजिये । फिर आप अपनी जी हुई जिस भी वस्तु को देखोगें वह आप को पृथक् नहीँ दिखेगी ।
यह बात गहनता होने पर दिव्य निकुँज रस तक लें जा सकती है - सत्यजीत तृषित ।

Comments

Popular posts from this blog

युगल स्तुति

॥ युगल स्तुति ॥ जय राधे जय राधे राधे, जय राधे जय श्री राधे। जय कृष्णा जय कृष्णा कृष्णा, जय कृष्णा जय श्री कृष्णा॥ श्यामा गौरी नित्य किशोरी, प्रीतम जोरी श्री राधे। रसिक रसिलौ ...

वृन्दावन शत लीला , धुवदास जु

श्री ध्रुवदास जी कृत बयालीस लीला से उद्घृत श्री वृन्दावन सत लीला प्रथम नाम श्री हरिवंश हित, रत रसना दिन रैन। प्रीति रीति तब पाइये ,अरु श्री वृन्दावन ऐन।।1।। चरण शरण श्री हर...

कहा करुँ बैकुंठ जाय ।

।।श्रीराधे।। कहाँ करूँ वैकुण्ठ जाए.... जहाँ नहीं नंद, जहाँ नहीं यशोदा, जहाँ न गोपी ग्वालन गायें... कहाँ करूँ वैकुण्ठ जाए.... जहाँ नहीं जल जमुना को निर्मल, और नहीं कदम्ब की छाय.... कहाँ ...