अभिन्नता को जीवंत कीजिये यह आपको परम् रस से सहज एक कर देगी - सत्यजीत तृषित ।
अभिन्नता को जीवन्त करने हेतु स्वयं को हर रूप में जी लीजिये । एक जल की बुंद से , एक रज कण तक सब । कभी पवन , कभी पाषाण , कभी पुष्प , कभी काँटा सब जी लीजिये । फिर आप अपनी जी हुई जिस भी वस्तु को देखोगें वह आप को पृथक् नहीँ दिखेगी ।
यह बात गहनता होने पर दिव्य निकुँज रस तक लें जा सकती है - सत्यजीत तृषित ।
॥ युगल स्तुति ॥ जय राधे जय राधे राधे, जय राधे जय श्री राधे। जय कृष्णा जय कृष्णा कृष्णा, जय कृष्णा जय श्री कृष्णा॥ श्यामा गौरी नित्य किशोरी, प्रीतम जोरी श्री राधे। रसिक रसिलौ ...
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