आवहु ललिता आजू बधाई जू गाइये
मेरे प्राण के प्राण लडैति लड़ाईये
लावहु साजी समाज सखी सब सोहनी
बलि बलि प्रीतम लहू मुरलिया मोहनी
यह मो जीवन मुरी सखी हित रूपिणी
सकल सार को सार अधार स्वरूपिणी
यह मो अँखियन ज्योति हृदय संपुट मणि
सुख संपति सर्वस्व हमारे धन धनी
यह है वंशी लेत अधर पिय स्वाद को
धुनि है श्रुति मम पैठि करत उन्माद को
पोषत वृंदा रूप तरु लता बेलि को
है हित सजनी हमे सिखावत केलि को
कोटि प्राण यह एक अनेकन वपु धरे
परम प्रेम सो तोषी पोषी हियरा हरे
याके गुण जो अपार कोटि मुख क्यों कहौ
मीन जलधि की थाह दीन कैसे लहौ
या के बल हम जीये, जिवावनहार ये
याहि को सब खेल खिलावनहार ये
याकि सकल विभूति अनुपम धाम ये
याकि सब रस केलि परम विश्राम ये
याके बल सब रास विलासन हम करे
याकि भुज अवलंबि सूरत सागर तरे
यही दुवावै प्रेम उछारे केलि में
आप एक रस रहे उभय रस झेल में
यह जल हम है मीन सदा ज्याये जिये
यही प्यास यही नीर पिवावे ज्यो पीये
याही को व्रत एक हमारे जानिये
दोउन हिय की सार परम निधि मानिये
हम याके आधीन सदा रुख ले रहे
जा को यह दै देइ सु ताकौ ह्वै रहे
जहं याको संबंध रंच हु देखिये
तहँ पहिले आधीन युगल हम लिखिये
याके तन मन प्राण, प्राण की प्राण हौं
ये मम तन मन प्राण सखी साँची कहो
मेरे हित अवतार अवनि इनने लियो
मो सो ले निज मंत्र प्रकाशित जग कियो
धन्य धन्य बलि जाऊ द्योस यह चंद को
उदय आज हरिवंश रसिक रस कंद को
धन्य धन्य यह मास गहि हित टेक की
राधा माधव नाम युगल वपु एक ही
बलि बलि ग्रह तिथि पक्ष ऋक्ष औ पलधरी
मेरे मन की साध सबै पूरण करी
छीन छीन बाढै उमंग ह्रदय नही माय री
रोम रोम रस सिन्धु अधिक अकुलाय री
तुंग तरंगन परयो न चित्त ठहराय री
प्रेम प्रवाह अथाह ब्रह्मौ सो जाई री
कहत कहत तनु कम्प पुलक गद गद भई
स्नेह सलिल दृग दौरी सखी भुज भरी लई
काहे होत अधीर कहौ बलि हिय की
तुम जू प्रिया अवलंब हमारे जिय की
बढतो जान्यौ सोच भुजा ललिता गहि
कहा अनमनी होत आजू हँस के कही
श्री हरिवंश सु जन्म द्योस उत्साह सो
अपने हिय की बात कहौ जू उमास सो
सत्य सत्य सुन सखी बात तौसो कहौ
लेय जो याको नाम ऋणी ताकौ रहौ
याकि तन की वायु परसी जाकौ करे
बलि बलि ताकि जाऊ जू पद रज सिर धरे
जिनको यासौ हेत मोल मोहि तिन लई
जाकौ चाहे देय जू तिन कर बिक गई
ता मुख की बलि जाऊ जू नाम सुनावही
सर्वस ता पर देऊ जो हित गुण गावहि
याके भजतन भजे, भजे पुनि ताहि जो
सर्वोपरि सब भाँती हमारे आहि जो
ज्यो ज्यो सरिता नीर जू निचौ जावही
त्यों त्यों गहरो होई पार को पावही
तैसे यह हित हेत सदा बढ़तो रहे
बलि बलि ताकि जाऊ शरण हित की गहे
हम दोउ तन मन प्राण एक ही जानिये
दुहुन प्राण को प्राण व्यास सूत मानिये
छांड़ी खेल को भाव प्रगट जग यो कही
तब प्रियतम हु उमगि साखी किन्ही सही
हाँ ललिता यह सत्य सत्य उर आनिये
हम तन मन हिय जिय यही निधि जानिये
हम अधनी धन धनि यही दातार है
अति उदार रिझवार खुले दरबार है
जहाँ नाम हरिवंश प्रिया तहँ देखिये
प्यारी हु ते प्रथम मोहि तहँ लेखिये
दै जू अचल विश्वास दृढाऊ प्रीति मैं
अपने बल ले जाऊ खेंची रस रीति में
भूली स्वप्न हु माहि शरण हित की गहे
झूठी साँची होई सु दुर्लभ गति लहे
सुनि फूली ललितादि बलैया लेत है
चिरजीवौ हरिवंश अशिषे देत है
अटल होय तुव राज जगत सब उद्धरौ
भोरी हु से महा पतित पावन करौ
जय जय ध्वनि है रही सकल लोकन छई
सुनी हित भोरी दौरी शरण हित की लई
प्यारी जू की प्रीति कही क्यों जावही
बूंद दिखाये सिन्धु न हियरे आवही
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