Skip to main content

चुरायो बरजोरी चित मोर

चुरायो बरजोरी चित मोर।
ऐसो ढीठ देत फिर नाहीं,सुनत न नैंकु निहोर।
लेत चित्त फिर पास न झाँकत,विनती सुनत न मोर।
तरसि-तरसि मैं मरहुँ विरह में,तरस न करत कठोर।
परी फेर में वाके सजनी वह लंगर-सिरमौर।
आग लगाय तमासो देखे,तकै न वाकी ओर।
कापै जाय पुकार करों अब,अपनो दिखत न और।
जैसा है अपनो है वह ही, वा लगि मेरी दौर।
आ चितचोर चोर मोहँकों,क्यों तरसावै और।
मैं तेरी ह्वै रहों सदाकों,रहै न दूजी ठौर।
तेरी तो मैं सदा-सदा हों,काहे न लेत अँकोर।
मैं न रहूँ बस रहे एक तू-यही लालसा मोर।

Comments

Popular posts from this blog

युगल स्तुति

॥ युगल स्तुति ॥ जय राधे जय राधे राधे, जय राधे जय श्री राधे। जय कृष्णा जय कृष्णा कृष्णा, जय कृष्णा जय श्री कृष्णा॥ श्यामा गौरी नित्य किशोरी, प्रीतम जोरी श्री राधे। रसिक रसिलौ ...

वृन्दावन शत लीला , धुवदास जु

श्री ध्रुवदास जी कृत बयालीस लीला से उद्घृत श्री वृन्दावन सत लीला प्रथम नाम श्री हरिवंश हित, रत रसना दिन रैन। प्रीति रीति तब पाइये ,अरु श्री वृन्दावन ऐन।।1।। चरण शरण श्री हर...

कहा करुँ बैकुंठ जाय ।

।।श्रीराधे।। कहाँ करूँ वैकुण्ठ जाए.... जहाँ नहीं नंद, जहाँ नहीं यशोदा, जहाँ न गोपी ग्वालन गायें... कहाँ करूँ वैकुण्ठ जाए.... जहाँ नहीं जल जमुना को निर्मल, और नहीं कदम्ब की छाय.... कहाँ ...