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पता नहीं कुछ रात-दिवस का

पता नहीं कुछ रात-दिवस का, पता नहीं कब संध्या भोर।
जागृत-स्वप्न दिखायी देता श्याम सदा मेरा चितचोर।।
भूल गयी मैं नाम-धाम निज, भूल गयी सुधि हूँ मई कौन।
नयन नाचकर, प्राण हरण कर, खड़ा हंस रहा धरकर मौन।।
कैसी मधुर छवि, वह कैसा था विचित्र मनहारी रूप।
आँखें झूर रहीं, झरती नित, करती स्मृति सौंदर्य अनूप।।
मर्म बेधकर धर्म मिटाया, किया चूर सारा अभिमान।
लोक-लाज, कुल-कान मिटी सब, रहा न कुछ निज-पर का भान।।
हा! कैसा विधु-वदन सुधामय, विचर रहा कालिन्दी-कूल।।
मनसा मिल रहते मेरे सब अंग नित्य प्रेम के अंग।
नहीं छूटता कभी, सभी विधि रहता सदा श्याम का संग।।
रसमय हुयी नित्य रस पाकर रसिक-रसारणव का सब ओर।
वही रस-सुधा-सरिता-धारा प्लावित कर सब, रहा न छोड़।
श्याम रहे या रही मैं---कहीं कुछ भी नहीं संधान।
श्याम बने मैं, श्याम बनी मैं, एकमेक हो रहे महान।।

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