जिस व्यक्ति के जीवन में यह स्मरण आ जाता है कि मृत्यु सब छीन ही लेगी
यह दो घड़ी का जीवन, इसको उत्सव में क्यों न रूपांतरित करें !
इस दो घड़ी के जीवन को प्रार्थना क्यों न बनाएं !
पूजन क्यों न बनाएं !
झुक क्यों न जाएं—कृतज्ञता में, धन्यवाद में, आभार में !
नाचें क्यों न, एक—दूसरे के गले में बांहें क्यों न डाल लें !
मिट्टी मिट्टी में मिल जाएगी। यह जो क्षण—भर मिला है हमें, इस क्षण—भर को हम सुगंधित क्यों न करें !
इसको हम धूप के धुएं की भांति क्यों पवित्र न करें, कि यह उठे आकाश की तरफ, प्रभु की गूंज बने !!!
ओशो
Comments
Post a Comment