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चक्रव्यूह अर्थात् - तृषित

चक्रव्यूह अर्थात् है नयन तुम्हारे
अधर अर्थात् परमेष्ठ सुभद्र सुफल हमारे

थे कुमुदिनी पर सौंदर्य भरते पात तुम थे
फिर उस सौंदर्य पर आसक्त रससुदन तुम थे

उलझते नहीँ हम केशव केशुं संग तब भी
छुटते टूटते नाते में उलझते क्या हम ही थे

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