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🌹श्री चैतन्योक्त श्लोक 🌹
🌻शिक्षाष्टक श्लोक -३🌻
तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना l
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः ll
👉भावार्थ:- हरिनाम संकीर्तन करने वाले पुरुष को किस प्रकार के गुरु बनाने चाहिए और दूसरों के प्रति उसका व्यवहार कैसा होना चाहिए, इसको कहते है - भागवत बनने वाले को मुख्यतया दो गुरू बनाने चाहिए, एक तो तृण और दूसरा वृक्ष। तृण से तो नम्रता की दीक्षा ले, तृण सदा सबके नीचे ही पडा रहता है। कोई दयालु पुरूष उसे उठाकर आकाश में चढा भी देते है, तो वह फिर ज्यों का त्यों पृथ्वी पर आकर पड जाता है। वह स्वप्न में भी किसी के सिर पर चढने की इच्छा नहीं करता। तृण के अतिरिक्त दूसरे गुरू (वृक्ष) से सहिष्णुता, की दीक्षा लेनी चाहिए सुन्दर वृक्ष का जीवन परोपकार के लिये ही होता है। वह भेदभाव शून्य होकर समान भाव से सभी की सेवा करता रहता है। जिसकी इच्छा हो वही उसकी सुखद शीतल सघन छाया में आकर अपने तन की ताप बुझा ले। जो उसकी शाखाओं को काटता है, उसे भी वह वैसी ही शीतलता प्रदान करता है और जो जल तथा खाद से उसका सिंचन करता है, उसको भी वैसी ही शीतलता। उसके लिए शत्रु और मित्र दोनों समान हैं उसके पुष्पों की सुगंधि जो भी उसके पास पहुंच जाये वही ले सकता है। उसके गोंद को जो चाहे छुटा लावें। उसके कच्चे पक्के फलों को जिसकी इच्छा हो वही तोड लावे। वह किसी से भी मना नहीं करेगा। दुष्ट स्वभाव वाले पुरूष उसे खूब फलों से समृद्ध देखकर डाह(इर्ष्या) करने लगते है और इर्ष्या वश उसके ऊपर पत्थर फेंकते हैं किन्तु वह उनके ऊपर तनिक भी रोष नहीं करता, उल्टे उसके पास यदि पके फल हुए तो सर्वप्रथम तो प्रहार करने वाले को पके ही फल देता है, यदि पके फल न मौजूद हुये तो कच्चे ही देकर अपने अपकारी के प्रति प्रेमभाव प्रदर्शित करता है। दुष्ट स्वभाव वाले उसी की छाया में बैठकर शान्ति लाभ करते हैं। पीछे से उसकी सीधी शाखाओं को काटने की इच्छा करते है। वह बिना किसी आपत्ति के अपने शरीर को कटाकर उनके कामों को पूर्ण करता है। उस गुरू से सहिष्णुता सीखनी चाहिए।
मान तो मृगतृष्णा का जल है इसलिए मान के पीछे जो पडा, वह प्यासे हिरण की भाँति सदा तड़फ-तड़फ कर ही मरता है, मान का कहीं अन्त नहीँ, ज्यों-ज्यों आगे बढते चलो त्यों ही त्यों वह बालुकामय जल और अधिक आगे बढता चलेगा। इसलिए वैष्णव को मान की इच्छा कभी न करनी चाहिए किन्तु दूसरों को सदा मान प्रदान करते रहना चाहिए। सम्मान रूपी सम्पत्ति की अनन्त खानि भगवान् ने हमारे ह्रदय में दे रखी है। जिसके पास धन है और वह धन की आवश्यकता रखने वाले व्यक्ति को उसके माँगने पर नहीं देता वह कँजूस कहलाता है। इसलिए सम्मान रूपी धन को देने में किसी के साथ कंजूसी न करनी चाहिए। तुम परम उदार बनो, दोनों हाथों से सम्पत्ति को लुटाओ, जो तुमसे मान की इच्छा रखे उन्हें तो मान देना ही चाहिए किन्तु जो न भी माँगे उन्हें भी बस भर-भर कर देते रहो। इससे तुम्हारी उदारता से सर्वाँतरयामी प्रभु अत्यंत ही प्रसन्न होंगे। सभी में उसी प्यारे प्रभु का रूप देखो। सभी को उनका ही विग्रह समझकर नम्रता पूर्वक प्रणाम करो। ऐसे बनकर ही इन सुमधुर नामों के संकीर्तन करने के अधिकारी बन सकते हैं ।
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