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वो ही खामोशियो मे संग रहे हरदम , आँचल सखी जु

वो ही खामोशियो मे संग रहे हरदम
मुझ दरिया के किनारे है वो
बहने नही देते दूर खुद से जरा अपने
मुझ नासमझ के सहारे है वो
जो मै पकडे होती बाह कभी उनकी
तो छूट ही जाती खो ही जाती
मगर खुद ही बाह को थामे है वो
वो पल भी आये जब राह थी ही न कोई
तब तब खुद राह बन जाते है वो
रोने को जी हुआ जब जब कभी मेरा
किस बात पे रोना था,भुला जाते है वो
चलो छोडो क्यू बात बढाये यारो
बस इतना ही कहेगे अब,मुझमे मुझसे ज्यादा है वो

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