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श्री जी से अभिलाषा

अभिलाषा 
कब निरखौ बरसाने में ऊँचे महलन वारी ।
अनुपम रूप मधमाते नैना वृषभानु दुलारी॥
राधा बाग अति मनोहर कलित तरूवर छाँही।
कब निरखौं कर सोरह श्रँगार बैठत सब सखियन माहीं॥
ललिता विशाखा चम्पकलता संग खेलत सांझी लीला।
मधुर कंठ कोकिल बयनीसे गावत राग रसीला॥
कब निरखौं ब्रज बीथिन विरहत राधा कुंवर कन्हाई।
पाँय पलोटत प्यारी जू के सुन्दर कुंजन माँही॥
कब निरखौं सब सखियन मध्य नृतत भानुदुलारी।
पहरे सतरंगी लंहगा घुंघर वारो लागे अति हि प्यारी ॥
कब निरखौं दोउन को ब्रज गलियन में खेलत आँख मिचौली।
छुप जाये जब सब सखियाँ दोनो करत ठिठोली।॥
कब निरखौं गोरे नागों (प्यारी जु कि भुजाऐं)को श्याम कंठ में धारे।
गोरी कमर को पकड़ कर बैठे नाग कारे कारे(प्रीतम कि भुजाएँ )
कब निरखौं धेनु रज रंजित घुंघरारी जुल्फें काली।।
गोधूली बेला में गोउन के पीछे बन से आते वनमाली॥
कब निरखौं लै लठिया माँगत दान दघि को सांकरी खोर।
इन नैनन में  विनोद केवल प्यास दर्शन कि प्यारे माखन चोर

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