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अति प्रचार और अमृत वितरण - तृषित

किसी भी पथ का जब अति प्रचार हो तब संभव है कि विकार उत्पन्न हो क्योंकि वहाँ मूल भाव का स्पर्श ना करते हुए जनमानस मात्र जनमानस का अनुगमन करता है अर्थात् अन्यों की नकल मात्र तब दिखती है , सभी अनुयायी सम स्थिति पर नही होते और अनुसरण भंग होकर अपनी - अपनी छद्मता उसमें झोंक दी जाती है , ऐसा भी सम्भव है कि जिस उद्देश्य के लिए वह यात्रा प्रकट हुई हो उस उद्देश्य के ही विपरित वह अति प्रचार से कौतुक हो रहे हो । 

मदिरा अथवा विषैली लताओं का सार भी औषधिवत् ग्राह्य है जब तक औषधी रूप में वह है ।
औषधी से पृथक् वह विकृति ही प्रकट करती है (औषधी - सिद्धान्त) । औषध का भोग सँग होने पर उनका दिव्य प्रभाव क्षीण हो सकता है । 

अमृत भी सभी के लिये नही है । कोई कहे यह प्रकट भक्ति पथ भी क्या कालान्तर में अधर्म हो सकते है (पूर्णिमा जैसे ग्रहण हो जाती वैसे हो सकते है) , तब भी मूल धर्म या भक्ति पूर्णतः लोप नहीं ही होंगे क्योंकि वह अन्नत भाष्य आदि में सहज संग्रहित ही है ... तब भी अन्नत प्राणियों में उच्छलन हुआ यह रस जिसे भक्ति समझा जा रहा है , यह सैद्धांतिक नहीं होने से मात्र भक्ति का आभास ही है , अमृत वितरण के कौतुक हेतु यहाँ मोहिनी अवतरण देखना चाहिये ।  सुर और असुर स्थिति में सुर स्थिति में ही अमृतपान हो यह चाह कर मोहिनी अवतरण लेने पर अमृत वितरण स्वयं मोहिनी अवतरण सँग श्रीहरि करें तब भी राहु-केतु अमृतपान करते है जिससे अमृत का असुरत्व में प्रवेश होने से अपभृंश प्रकट होते है । कितनी ही सतर्कता हो राहु केतु अमृतपान करेंगें यह पुरातन तथ्य है तदपि श्री हरि की अपनी ओर से असुरत्व में अमृत-वितरण नही किया जाता (श्रीहरि-आश्रय से पृथकताओं की माँग ही असुरता है) - युगल तृषित ।

श्री हरि से शेष किन्हीं पृथकताओं के पोषण हेतु लिया गया श्रीहरि-आश्रय विशुद्ध भक्ति नहीं हो पाता है , प्रथम तृषा शुद्धि की आवश्यकता है जो कि शास्त्र या रसिक वाणियों में ही निहित है । 

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