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पद 18 - 2 - 2016

दोउन न दिखत सखी एकहु ही मैं देखूँ
बरसत प्रेम या नैनन पे गिरत सब भेदन दृगन के

एक ही रंग ,
एक ही बदन ,
एक ही केलि ,
एक ही रूप और भाष
एक शब्द
एक समय उचारे
निरखे अपलक अलिन
दोउन अब एक रूप री

आज न बनी बात सखी
पिया देखे ज्यो ही लली
मुख चन्द्र सु नेना न हिली
देखत देखत रैन कबहुँ बीती
हम अलिन की लाज लाडिली
उलझी इक डोर ज्यो हरत हरि

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