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दीवारी मंगलाचार , sangini joo संगिनी जू

*दीवारी मंगलाचार* आज दिवारी मंगल चार। ब्रजजुवति मिलि मंगल गावत, चौक पुरावत नन्द द्वार। मधुमेवा पकवान मिठाई भरि भरि लिने कंचन थार। 'परमानंद' दास को ठाकुर भूखन बसन रसाल। दीप...

भाव लालसा । सँगिनी

हर्ष...उन्माद...रस...आनंद...यही चाह रहे ना तुम सब...पर चाहना करना नहीं जानते...जानते केवल जागतिक व्यवहार...चाहते तो परमानंद हो पर माँगना नहीं आता तो धन... सिद्धि...शांति... सेवा... विद्या... और जा...

परस्पर सेवक परस्पर सेव्य , संगिनी सखी जू

*परस्पर सेवक परस्पर सेव्य* सुनहली रस की उज्ज्वल सेज पर सजै *दोऊ चंद दोऊ चकोर...* तृषित अधर...उमगित हियहर्षिणी... *करत सिंगार परस्पर दोऊ* इक नयन ते आरसी सुख निहारत...दूजो नैन सलोनी ताम...

तृषा वर्धन , बांवरी जू

*तृषा वर्धन*      चेतना सदा से तृषित है, अतृप्त है क्योंकि छूटी हुई है उस महाचैतन्य से।पुनः उस महाचैतन्य केे रस स्पर्श ही इसकी वास्तविक तृषा उदित होने लगती है, वर्धित होने लग...