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भाव लालसा । सँगिनी

हर्ष...उन्माद...रस...आनंद...यही चाह रहे ना तुम सब...पर चाहना करना नहीं जानते...जानते केवल जागतिक व्यवहार...चाहते तो परमानंद हो पर माँगना नहीं आता तो धन... सिद्धि...शांति... सेवा... विद्या... और जा...

परस्पर सेवक परस्पर सेव्य , संगिनी सखी जू

*परस्पर सेवक परस्पर सेव्य* सुनहली रस की उज्ज्वल सेज पर सजै *दोऊ चंद दोऊ चकोर...* तृषित अधर...उमगित हियहर्षिणी... *करत सिंगार परस्पर दोऊ* इक नयन ते आरसी सुख निहारत...दूजो नैन सलोनी ताम...

तृषा वर्धन , बांवरी जू

*तृषा वर्धन*      चेतना सदा से तृषित है, अतृप्त है क्योंकि छूटी हुई है उस महाचैतन्य से।पुनः उस महाचैतन्य केे रस स्पर्श ही इसकी वास्तविक तृषा उदित होने लगती है, वर्धित होने लग...

अमितानुरागिणी वेणु वेणु जय जय वेणु जय श्रीवेणु , बाँवरी जू

*अमितानुरागिणी वेणु वेणु जय जय वेणु जय श्रीवेणु*      श्रीवेणु जो अपने रव रव से श्रीहित सुधा, प्रेम सुधा पिला रही है, इस वेणु के भीतर ऐसा दिव्य रस भर रहा है श्रीस्वामिनी जु का ...

हा...हा...करत ना देति , सँगिनी । पीताम्बर-मुरली लीला ।

Do not SHARE हा...हा...करत ना देति... सखियन संग प्राणप्रियतमा भोरी किशोरी जू सिंगार कुंज में रसहिलोर में सिंगार धरातीं रसीली सखियन की कोमल छुअन से स्पंदित सिहरित हो रहीं हैं...सखिगण लज्जा...

श्रीगुरु चरन लड़ाइहौं , संगिनी जू भाव

Do not Share "प्रथम जथामति श्रीगुरु चरन लड़ाइहौं। उदित मुदित अनुराग प्रेम गुन गाइहौं।। गौरस्याम सुखरासि तिनहैं दुलराइहौं। देहु सुमति बलि जाऊं आनंद बढ़ाइहौं।। आनंद सिंधु बढ़ाइ ...