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र से रस , कृष्ण संगिनी जु

!!कृष्ण !! एक अति गहनतम रस झन्कार 'र' शब्द की थिरकन में और अत्यधिक गहनतम प्रगाढ़तम रस झन्कार इस सरगम के रसराज प्रियतम से जुड़े होने में है।कृष्ण परात्पर जगत के स्वामी जिन्हें रस...

प्रेम को मूरत प्रेम को सूरत , मृदुला

श्री राधिका प्रेम को साकार विग्रह श्री प्रिया जू और उनका स्वत्व ...... प्रेम को मूरत प्रेम को सूरत प्रेम को अलकन प्रेम को पलकन प्रेम को नैनन प्रेम को अधरन प्रेम को बैनन प्रेम को ...

रस ही रस लीला भाव , मृदुला

नवल नागरी पिय उर भामिनी निकुंज उपवन में सखियों सहित मंद गति से धरा को पुलकित करती आ गयी हैं ॥ प्रिया के मुखकमल की शोभा लाल जू को सरसा रही है ॥ विशाल कर्णचुम्बी कमल दल लोचन जैस...

र से रस , 51 , संगिनी जु

!! प्रेम !! श्रीवृंदावन में दसों दिशाओं में प्रेम का अद्भुत पसारा ऐसा जैसे वहाँ प्राकृतिक पवन नहीं परस्पर प्रेमरत श्वासों से महकी मधुर ब्यार तरंगायित होती है।जिसकी मधुर रस ...

र से रस , 50 , संगिनी जु

!! रस !! रसस्वरूप श्रीकृष्ण परात्पर और महाभावरूपा राधे जु जहाँ विराजती विहरती हैं वहाँ की कुंज निकुंजों में प्रेम प्राणवायु बन बहता है और रस बन हृदय मंदिर में उतरता है।रगों ...

"हौं चरणनिं कौ चेरौ" 4

"हौं चरणनिं कौ चेरौ"                 -41- एकहु रस रंगै रहै एकहू प्राण दोऊ नेकि जु भाव करै पिय तु प्रेम सुख सहज हेति निंदिया हारि बैठि तहाँ दु फूलि मग्न सचेति पावै सेवन कू पावन सुख ...

रसभींजै रसतृषित रसयुगल

रसभींजै रसतृषित रसयुगल               -1- अति रस बाढ़ियो तन मन अर्पण करि डारयो एकहू देह द्विप्रानण छबि न्यारि चंद्र चाँननि पसरायो एकहू टक निहारि रहै रंग रूप निजतन कू बिसारि...